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जब तक हम अपने मन से वैर, विरोध,लालच,निंदा को नहीं त्याग देते तब तक हम गुरु की अनमोल वाणी का रस प्राप्त नहीं कर सकते : आनंदमूर्ति गुरु मां

जब तक हम अपने मन से वैर, विरोध,लालच,निंदा को नहीं त्याग देते तब तक हम गुरु की अनमोल वाणी का रस प्राप्त नहीं कर सकते : आनंदमूर्ति गुरु मां

बटाला (अविनाश शर्मा ) : गुरु तेग बहादुर साहिब जी का 400 वर्ष शहीदी गुर पर्व दिवस हिमाचल सरकार और गुरुद्वारा सिंह सभा की ओर से रिज मैदान देवभूमि शिमला में गुरु ग्रंथ साहिब जी की रहनुमाई में बहुत ही श्रद्धा भावना के साथ मनाया गया। इस प्रोग्राम में आनंदमूर्ति गुरु मां आश्रम गनौर हरियाणा की ओर से प्रोग्राम को चार चांद लगाते हुए शुरुआत तेरे अंग संग वाहेगुरु के शब्द के साथ की। उनकी इस मीठी और सुरीली आवाज ने पंडाल में बैठे हजारों लोगों को खुशी में झूमने के लिए मजबूर कर दिया। भारी बारिश होने के बावजूद गुरु की संगत दूर-दूर से बड़ी संख्या में दर्शन के लिए पहुंची। गुरु मां ने कहा कि शिमला की देवभूमि में आयोजित गुरु जी के इस कार्यक्रम में पहुंचने का उन्हें सौभाग्य प्राप्त हुआ है। उन्होंने कहा कि वह अपना सौभाग्य समझते हैं कि प्यारी संगत के साथ मिलकर गुरु की गोद का आनंद ले रहे हैं। उन्होंने ने कहा कि सतगुरु जी के इस प्रकाश दिवस की खुशी केवल सिख समाज को ही नहीं बल्कि देश प्रदेश में रह रहे प्रत्येक व्यक्ति को होनी चाहिए क्योंकि सतगुरु ने जो समाज के लिए किया है ऐसा पूरी दुनिया में करने वाला कोई भी दयालु नहीं मिलेगा। कहा कि अपने लिए और अपने स्वार्थ के लिए तो सभी जीते हैं और अपना पेट भरने के लिए सभी काम करते हैं लेकिन मन के स्वार्थ और अहम बुद्धि, अहंकार फिर भी व्यक्ति के अंदर लीला करता रहता है। गुरु मां ने कहा कि जब कोई अपनी ताकत का इस्तेमाल दीन की रक्षा के लिए कर रहा हो और ऐसे जालिमों को मुंहतोड़ जवाब दे रहा हो तो ऐसे एक के बाद एक युद्ध में फतेह कायम करने वाले श्री गुरु तेग बहादुर महाराज फिर उतने ही जीवन में नाम स्मरण ब्रह्मविद्या और उच्चत्तम ज्ञान की जो आवस्था हो सकती है उस अवस्था का आनंद मानने के लिए जाकर बाबा बकाला भी बैठ गए। एक लंबा समय सतगुरु जी बाबा बकाला में निवास किया और यह भी कहा गया है सतगुरु जी महाराज के दिन में दर्शन किसी को भी नही हुए है क्योंकि सुबह के स्नान के बाद महाराज अपने भोरा साहब में गद्दी पर ध्यान करने बैठ जाते थे और इतिहासकार इस बात के गवाह है कि माता जी भोजन का थाल सजाकर दरवाजे के नीचे से ही सरका देते थे क्योंकि महाराज भोजन ग्रहण करने के लिए भी कमरे से बाहर नहीं आते थे। उन्होंने कहा कि महाराज की वाणी में जो रस टपकता है अगर उसका किसी ने आनंद माना ही नहीं है तो उसने गुरु की असल बानी का स्वाद भी नही लिया है। उन्होंने कहा कि जब तक पूर्ण शब्दों के साथ अपने मन के ज्ञान कपाट खोलकर वाणी के एक एक शब्द को समझने की कोशिश करेगा तभी उस वानी का वैराग मिलेगा। गुरु मां ने कहा कि जब तक हम अपने मन से वैर, विरोध, लालच, निंदा को नहीं त्याग देते तब तक हम गुरु की अनमोल वाणी को नहीं समझ सकते। इसलिए हमें सुबह और शाम सच्चे मन से गुरु की वाणी का ध्यान करना चाहिए। अंत में हिमाचल सरकार अधिकारियों और गुरुद्वारा सिंह सभा की ओर से आनंदमूर्ति गुरु मां को सम्मान किया गया। कार्यक्रम दौरान संगत में गुरु जी का अटूट लंगर वितरित किया गया।