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13 जुलाई गुरु पूर्णिमा-व्यास पूर्णिमा विशेष : जाने गुरु का शिष्य के जीवन में क्या होता है महत्व

EDITORIAL SPL YOGESH GUPTA गुरु का अर्थ (महत्व) गु शब्द का अर्थ है अंधकाररु शब्द का अर्थ है प्रकाश । जो शिष्य को अंधकार से प्रकाश की और ले जाते है उसे गुरु कहते है । श्री गुरुगीता में दोहा है ” गुरुर्ब्रम्ह गुरुर्विष्णु गुरुदेवो महेश्वरः गुरुरसाक्षात प्रहब्रम्ह तस्मै श्रीगुरुभ्यो नमः ” । संत महापुरुषों के पास हम निःस्वार्थ, निःसंदेह, तर्करहित होकर केवल प्रेम के पुष्प लेकर पहुँचते हैं, श्रद्धा के दो आँसू लेकर पहुँचते हैं तो बदले में हृदय के द्वार खुलने का अनुभव हो जाता है । जिसे केवल गुरुभक्त जान सकता है ।

जीवन में संपत्ति, स्वास्थ्य, सत्ता, पिता, पुत्र, भाई, मित्र अथवा जीवनसाथी से भी ज्यादा आवश्यकता सदगुरु की शरण है । सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, ऐसे ही गुरुचरण में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति व सुखमय जीवन की प्राप्ति होती है। पारंपरिक रूप से शिक्षा देने वाले विद्यालयों में, संगीत और कला के विद्यार्थियों में आज भी यह दिन गुरू को सम्मानित करने का होता है ।

प्राचीन काल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करता था तो इसी दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपने गुरु का पूजन करके उन्हें अपनी शक्ति सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर कृतकृत्य होता था। अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को ‘गुरु’ कहा जाता है। गुरू पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरंभ में आती है । इसलिए अध्ययन के लिए इसे उपयुक्त माने गए हैं।

आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिवस भी है। इसीलिए इसे व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं। इस दिन अपने गुरु का निस्वार्थ भाव से पूजन करना अत्यंत आवश्यक है ।

गुरू की आज्ञा को स्वीकार कर जो चल पड़े वह सच्चा शिष्य है।
* गुरू वे हैं जो शिष्य को सदा के लिए शिष्य न रखे, शिष्य को संसार में डूबने वाला न रखें, शिष्य को जन्मने और मरने वाले न रखें। शिष्य को जीव में से ब्रह्म बनाने का मौका खोजते हों वे गुरू हैं, वे परम गुरू हैं, वे सदगुरू हैं। सच्चे गुरू शिष्य को शिष्यत्व से हटाकर, जीवत्व से हटाकर, ब्रह्मत्व में आराम और चैन दिलाने के लिए, ब्रह्मरस की परम तृप्ति और परमानन्द की प्राप्ति कराने की ताक में रहते हैं। ऐसे गुरू की आज्ञा को स्वीकार कर जो चल पड़े वह सच्चा शिष्य है।

*जिसने सदगुरू के ज्ञान को पचा लिया, सदगुरू की पूजा कर ली उसे संसार खेलमात्र प्रतीत होता है। राजा जनक ने संसार में खेल की नाँई व्यवहार करते हुए जीवन्मुक्त होकर परम पद में विश्रान्ति पायी | ऐसे ही तुम भी उन महापुरूषों की, ब्रह्मवेत्ता गुरूओं की कृपा को हृदय में भरते हुए, ज्ञान को भरते हुए, आत्म-शान्ति को भरते हुए, उनके वचनों पर अडिगता से चलते हुए गुरूपूर्णिमा के इस पावन पर्व पर घड़ीभर अन्तर्मुख हो जाओ।

*गुरूपूर्णिमा के पर्व पर परमात्मा स्वयं अपना अमृत बाँटते हैं। वर्ष भर के अन्य पर्व और उत्सव यथाविधि मनाने से जो पुण्य होता है उससे कई गुना ज्यादा पुण्य यह गुरूपूर्णिमा पर गुरु का पूजन करने से मिलता है ।