बटाला ( अविनाश शर्मा )
6 जून : दिव्य ज्योति जागृति संस्थान बटाला द्वारा विशाल सतसंग समागम का आयोजन किया गया। जिसके अन्तर्गत श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए सर्वश्री आशुतोष महाराज जी की शिष्य स्वामी विष्णुदेवानंद जी ने कहा कि मानव इस सृष्टि का सबसे श्रेष्ठतम प्राणी है। इसीलिए उसे यह अपेक्षा भी की जाती है कि वह उसके अनुरूप श्रेष्ठतम कार्य व्यवहार करें । अपने जीवन को सब प्रकार से स्वस्थ बना उसे सम्पूर्णता प्रदान करे। कठोपनिषद के अनुसार मनुष्य का जीवन मात्र उसके शरीर से संचालित नहीं है, यह शरीर तो एक रथ के समान है इसमें आत्मा रुपी रथ भी विद्यमान है, जिसका सारथी बुद्धि एवं मन लगाम है। अतः स्वस्थ जीवन केवल स्वस्थ शरीर पर कैसे निर्भर हो सकता है। सम्पूर्ण स्वास्थ्य तो तन मन और आत्मा तीनों के समग्र विकास पर आधारित है।
उदाहरणतः एक फल पूर्णता विकसित कब कहलाता है। तभी जब उसके बाह्य आवरण के साथ साथ भीतर का गुप्ता भी पक कर पूर्णतः रसीला हो जाए और बीज भी पूर्ण विकसित हो जाएँ । किसी भी एक भाग की अपरिपक्वता की स्थिति में वह फल खाने योग्य नहीं बनेगा। यदि बाहरी छिलका रुपी सुरक्षा कवच न पनपे तो भीतर के मुख्य फल की सुरक्षा कैसे हो और यदि मात्र बाहरी आवरण तैयार हो पर भीतर कुछ भी न रहे तब भी उस फल का अस्तित्व नहीं। इन दोनों भागों के साथ ही बीज तत्त्व का उन्नत होना सबसे आवश्यक है। क्योंकि बीज ही फल को ठोस आधार देता है। इस आधार के बिना फल अपने स्वाभाविक आकार को ही प्राप्त नहीं कर सकता। आज मानव जीवन अपूर्ण विकास के कारण ही अनेकों समस्याओं का ग्रास बन बैठा है। वह मात्र छिलके जैसे शरीर को तो सजाने में जुटा है परन्तु बीच तत्त्व आत्मा को सर्वथा भूल बैठा है। जबकि सत्य स्वरूप महापुरूषों ने हमें सदा इस आत्मा पर केन्द्रित हो, इसे विकसित व जागृत करने का आदेश दिया है। अतः ब्रह्म ज्ञान द्वारा दिव्य दृष्टि को प्राप्त कर अपने भीतर ज्योति स्वरूप परमात्मा का साक्षात्कार कर लेना ही जीवन का मूल लक्ष्य है इस पथ के पथिक की आत्मा ही पूर्ण रूप से जागृत होती है ऐसा ही जागृत रथी, बुद्धि रूपी सारथी को सही दिशा निर्देश दे पाने में सक्षम है। और ऐसे ही नियन्त्रित बुद्धि मन रुपी लगाम को कस कर, इंद्रियों रूपी घोडों को भटकने से बचा सकती है। इस प्रकार समन्वित चाल से ही जीवन पूर्ण रूपेण स्वस्थ और अपनी मंज़िल को प्राप्त कर सकता है। गुरुभाई धर्म सिंह,त्रिलोचन सिंह, भास्कर सिंह ने सुमधुर भजनो के द्वारा संगत को मंत्र मुग्ध किया। सारी संगत के लिए लंगर भंडारे का भी आयोजन किया गया।








