जिनके ऊपर ईश्वर की अथाह कृपा होती है,उनके जीवन में सद्गुरु का आगमन होता है क्योंकि गुरु का अर्थ ज्ञान है : गुरु माँ
बटाला 13 जुलाई (अविनाश शर्मा) आनंदमूर्ति गुरु मां के शिष्यों की ओर से गनौर स्थित ऋषि चैतन्य आश्रम गनौर हरियाणा में गुरु पूर्णिमा महोत्सव बड़े हर्ष उल्लास से मनाया गया । शिष्यों ने मिलकर गुरु स्तुति श्लोकों से सद्गुरु की वंदना की और गुरु का मानस पूजन किया। शिष्यों ने प्रेम से सराबोर होकर अश्रुपूर्ण नैनों से सद्गुरु का हृदय से नमन कर उनसे आशीर्वाद लिया। गुरु पूर्णिमा के उपलक्ष्य में आनंदमूर्ति गुरु मां ने अपने शिष्यों को संदेश देते हुए कहा कि जिनके ऊपर ईश्वर की अथाह कृपा होती है, उनके जीवन में सद्गुरु का आगमन होता है क्योंकि गुरु का अर्थ ज्ञान है। गुरु माँ ने कहा कि अध्यात्मिक साधना बिना गुरु की यात्रा से बहुत असंभव है जब हम ज्ञान की बात करते हैं जब हम गुरु की बात करते हैं तो यह इस विश्व में उतनी ही पुरानी है या प्राचीन है जितना शायद यह जगत प्राचीन है। उन्होंने कहा कि ज्ञान का पहला उपदेश जो इस विश्व में हुआ अब इसमें हिस्ट्री का ज्ञान हम नहीं छोड़ सकते हैं क्योंकि हिस्ट्री एक सब्जेक्ट की तरह जब तक शुरू हुआ वह कोई बहुत पुराना समय नहीं है लेकिन ज्ञान की परंपरा को हम आप और सही बोलते हैं आप और उसे मतलब जब पुरुष नहीं था तब भी ज्ञान था, जब पुरुष शरीर के रूप से सन्मुख होते हैं तब भी इस विश्व में खुशबू को भी फूल की जरूरत होती है बिना फूल के खुशबू नहीं हो सकती है लेकिन ज्ञान के लिए शायद किसी शरीर की भी जरूरत नहीं होती है और ज्ञान अपने आप को प्रकट करने के लिए अपने आप को एग्जिट करने के लिए शायद इस सृष्टि में नामरूप का सृजन भी इसीलिए हुआ क्योंकि जो है रहेगा और अस्तित्व को हम परमात्मा कहते उसी अस्तित्व का स्वरूप का प्रस्फुटन एग्जिट खुद अपने बारे में अपना ही ज्ञान परमेश्वर देता है जैसे यह जग हर का रूप है हर रूप नदरी है हर रूप नदरी आया इस संसार में से अलग नहीं है नामरूप जो दिखता है उसका अगर हम बात कर दें मतलब हटा दें या इस नाम और इस ग्रुप के पीछे क्या है उसको जाने निश्चय ही यह बात समझ में आएगी कि नामरूप सिर्फ प्रतीत होता है मीठा प्रतीत होता है वास्तविकता जिसकी है वह आधार अधिष्ठान परब्रह्म है और उसी अधिष्ठान पर ब्रह्म में नाम रुक्का जगत और सारी सृष्टि और यह सारा ब्रह्मांड है उसके प्रति हो रही शरीर को देखता है ज्ञानी आदमी को देखता है ज्ञानी आदमी को देखता है और हर रूप का एक नाम रख देता है लेकिन इस नामरूप के परदे के पीछे जो है उसी अस्तित्व को ब्रह्म परमात्मा आदि आदि शब्द से हम मनुष्य अपनी बुद्धि से उसको यह नाम भी हम मनुष्य ने दिया है लेकिन इसकी जो समझ इसका जो बौद्ध है है उसको पुराण बहुत सुंदर तरीके से कहते हैं कि पहले कुछ नहीं था फिर एक लहर उठी और उसी लहर का नाम विष्णु है उसी लहर का नाम शंकर है और उसी का नाम ब्रह्मा है और फिर इन तीनों शक्तियों के कार्य करने से यह सारा जगत होता है जैसे समंदर में लहरें उठती हैं वापस उसी में लीन हो जाती है ऐसे ही ब्रह्मा विष्णु और शंकर उसी ब्रह्मांड की एक लहर है जो ज्ञान मूर्ति है जो अपने आप में प्रतिष्ठित हैं अर्थात विष्णु कभी अज्ञानी नहीं होता शंकर कभी अज्ञानी नहीं सृष्टि के क्रम में कहा कि सबसे पहले ब्रह्मा ने सात ऋषियों को जन्म दिया अपने मन से सृष्टि बनाई और इस सृष्टि को एक श्री गणेश भी दिया गया। गुरु माँ ने कहा कि जो पहले सप्तऋषि है वही आत्मज्ञानी है, यह वह सात ऋषि हैं जिनके अंतःकरण पर अज्ञान का कोई पर्दा है ही नहीं अपने मूल स्वरूप का बौद्ध रखते हुए जो प्रकट होते हैं उन्हीं को हम सप्त ऋषि कहते हैं अभी यहीं सप्तर्षियों को आदेश मिलता है क्या अब शक्ति का सृजन है उसमें लग जाए अद्भुत बातें आती है कि ऋषि कश्यप और उनकी पत्नी से ही देवता और असुरों का जन्म हो जाता है बड़ी लंबी कथाएं चलती है लेकिन रूप क्या है और महापुरुष ज्ञानी होते हैं क्या इन शब्दों से ज्ञान की अलग अलग अलग अलग से अलग अलग भाषा बोलने वाले महापुरुष और महादेव हुए हैं जिनसे इस ज्ञान की धारा इस ज्ञान रूपी गंगा की धारा है उतनी ही चली आ रही है, समय बदलता है, युग बदलता है लेकिन ज्ञान की धारा कभी रुकती नहीं और न ही कभी रुकेगी। अनगिनत सत्य की खोज करने वाले बहुत थोड़े होंगे धातु इसी संसार के बंधन में बंध जाएंगे कुल परिवार धन संपत्ति का सृजन करते हुए फिर एक दिन समाप्त हो जाए लेकिन इन्हीं मनुष्य में कुछ ऐसे भी होंगे जिनको किसी ना किसी कारण से किसी ना किसी महात्मा के वरिष्ठ महात्मा का आशीर्वचन मिल जाएगा उसका दर्शन मिल जाएगा तब उसके अज्ञानी मन में यह भाव उठेगा क्या है सत्य इसको कैसे जान सकता हूं जिस दिन उसके अंदर यह प्रश्न उठता है उसी दिन से गुरु शिष्य की यह जो परंपरा है हम अगर उसको ढंग से समझना चाहे तो बहुत लोगों का बहुत माताओं का यह मानना है कि इसमें सर्वप्रथम जो है वह महादेव जिन्हें आदि देव महादेव महादेव का प्रथम शिष्य कौन है कोई और नहीं उनकी अपनी पत्नी ही शिष्य है तो यह गुरु और शिष्य का संवाद हुआ और आप देखें हमारे समस्त उपनिषद में यही संवाद चलता है शिष्य पूछ रहा है गुरु उत्तर दे रहे हैं यही संवाद कृष्ण और अर्जुन में राम और विशिष्ट में यही संवाद जनक में अष्टावक्र में यही संवाद जनक में और परीक्षित में यही संवाद यादों में और मैत्री में यही संवाद अत्रि ऋषि और अनुसूया में यही संवाद आज के समय में मैं जाऊं बहुत दूर अगर नहीं जाए श्री गुरु नानक देव महाराज और उनके शिष्य जो बाद में गुरु अंगद देव जी महाराज हुए यही संवाद चलता रहा स्वामी रामानंद और कबीर साहिब में यही संवाद गुरु शिष्य का जानने सीखने का इतनी लंबी है इतनी लंबी कढ़ी है शायद जितना संसार फैला हुआ है पूरे विश्व में भिन्न-भिन्न देशों में भी गुरु शिष्य की परंपरा किसी न किसी तरीके से चलती रही आज का दिन पूर्णमासी का दिन और इस पूर्णमासी पर हम गुरु को पूजते हैं गुरु को स्मरण करते हैं पर इस बात को बहुत अच्छे से समझ लीजिएगा गुरु मतलब शरीर नहीं होता है तो सिर्फ गुरु के शरीर का दर्शन करने लेने का नाम गुरु पूर्णिमा नहीं होता है गुरु चुकी शरीर नहीं गुरु स्वयं ज्ञान स्वरूप है तो उस ज्ञान स्वरूप से ज्ञान प्राप्ति की इच्छा रखते हुए विवेक और वैराग्य को अपने अंदर उत्पन्न करते हुए अपनी इंद्रियों को संयमित करते हुए अपने मन को संयमित करते हुए अनुशासन में जीते हुए और निरंतरता के साथ अपने अंदर मेरी बात भी कह देना चाहती हो गुरु कभी शिष्य था हर गुरु कभी शिष्य बन करके उसने साधना की है अपने गुरुदेव को आज्ञा पालन करते हुए उनके आदेश के अनुसार ज्ञान संबंध करते हुए घनघोर साधना की भक्ति में जिसने अपने आप को जलाया था कभी वही शिष्य जब साधना की पूर्णता को पाता है तो फिर वह शिष्य ना रह जाता है वह तो स्वयं के गुरु रूप हो जाता है तो यह यात्रा गुरु और शिष्य की नहीं है यह यात्रा उस शिष्य की है जो स्वयं को प्राप्त हो जाएगा मैं कह सकती हूं आप सब ठीक से साधना करते हैं आप अपने आप को विवेक और वैराग्य की आत्मा अनुसंधान की वेदांत श्रवण की योग की साधना की इस तपस्या को अगर आप करते हैं तो आप स्वयं एक ऋषि हो सकते हैं आप स्वयं एक महात्मा हो सकते हैं आप गृहस्ती में रहते हुए पर भी संत तत्व को प्राप्त होकर स्वयं संत हो सकते हैं प्रारब्ध में एकांतवास करते हुएआग को जलाकर रखना कि मैं सत्य को जाने संतोष होगा मेरे मन से पर्दा उठ जाएगा








