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गुरु ही व्यक्ति के भीतर पल रहे अहंकार व लोभ को कर सकता है खत्म : गुरु माँ 

बटाला (अविनाश शर्मा)

‌गुरु ही व्यक्ति के भीतर पल रहे अहंकार व लोभ को कर सकता है खत्म : गुरु माँ 

29   अक्तूबर  : सुख की चाह  सभी को है लेकिन दुःख किसी कोई नहीं चाहिए आज का मानव ऐसी कामना कर रहा है लेकिन मानव यह भूल चुका है कि सुख और दुःख दोनों जीवन के संग है, जो दुःख से घबराता है वह समझदार पुरुष नहीं है क्योंकि पुरुष कभी भी दुःख से घबराता नही है। यह अनमोल प्रवचन दीपावली पर्व के उपलक्ष्य में ऋषि चैतन्य आश्रम गनौर में आयोजित सतसंग के दौरान गुरु माँ ने कहे । उन्होंने कहा कि भारत एक ऐसा देश है जहां हम सुख अपने लिए नहीं विश्व के लिए मांगते है। सर्वे भवन्तु सुखिनः के तहत हम सभी के लिए सुख की कामना  करते है इसीलिए निजी रूप से सुख की कामना करना मूर्खता है। सतसंग के दौरान गुरु माँ ने मौजूदा शिक्षा निति पर कटाक्ष करते हुए कहा कि इस समय जो शिक्षा दी जा रही है वह सही नहीं है इस समय शिक्षा निति में बदलाव की बहुत जरूरत है क्योंकि स्कूलों ने सिर्फ डिग्री दी जा रही है बच्चों को संस्कार नहीं दिए जा रहे है। ऐसी शिक्षा नहीं होनी चाहिए जिससे बच्चा गुलाम और रोबोट बन रहे बल्कि ऐसी शिक्षा होनी चाहिए जिसमे बच्चे संस्कारित और अपने बड़ो का आदर करने वाले हो।  दीपावली पर्व की महत्वता पर प्रकाश डालते हुए गुरू माँ ने कहा कि अंधकार से कभी मत डरो। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अमावस्या काली होती है काली अमावस्या की रात को ही दिवाली होती है। उन्होंने कहा कि आज समाज के भीतर रहने वाले लोग  अपने अपने भीतर एक रावण को पाल रहे है विजयदशमी पर रावण को जलाने से कुछ नहीं होगा बल्कि अपने भीतर पल रहे रावण को फूंकने से मोक्ष मिलेगा इस लिए मन के भीतर के रावण को मार कर अपने अंतःकरण में विद्या का द्वीप जगाएं। सतसंग के दौरान एक शिष्य द्वारा पूछे गए प्रश्न मन की शांति व इच्छा पर काबू कैसे किया जाये तो गुरू माँ ने कहा कि यह जो अज्ञान और लालसा के अहंकार से पीड़ित मन है इसे सद्गुरू शरण में लगाना चाहिए क्योंकि एक अज्ञानी के भीतर शांति व अहंकार को सिर्फ गुरू ही दूर कर सकता है। गुरु माँ ने गुरु शिष्य प्यार के विषय पर उपदेश देते हुए कि शिष्य द्वारा आई लव यु कहने ,चिठ्ठी लिखने, घर में फोटो लगाना व रुपया पैसा चढ़ाना प्यार नही होता प्यार वोह होता है जिसमे सिर्फ गुरु के सिवा मन में और कुछ नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि कहा गया है कि पारस अगर लोहे को छुए वह स्वर्ण हो जाता है इसी तरह गुरु भी पारस की तरह है जो अपने शिष्य को स्वर्ण तो क्या वह पारस भी बना सकता है लेकिन शिष्य की गुरु के साथ ऐसी मैत्री होनी चाहिए कि गुरु शिष्य को अपना जैसे बना ले। उन्होंने कहा कि लेकिन इसके लिए शिष्य को अपने भीतर लोभ और अहंकार को खत्म करना होगा। गुरु माँ ने कहा कि आप कितने घंटे भगवान के नाम की माला जपते हो यह विषय नहीं है विषय यह है कि दिल से प्रभु नाम की कितनी माला जपी गई है यह असली विषय है। गुरु माँ ने कहा कि अहंकार को खत्म करने के लिए गुरु का होना जरूरी है क्योंकि गुरु ही व्यक्ति के अहंकार को खत्म कर सकता है।